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इंसान और वन्यजीवों में संघर्ष

आदतन आदमख़ोर जानवरों को हटाने के ऑपरेशन सटीक और कानूनी होने चाहिएसैद्धांतिक और बदले की भावना से भरे नहीं.

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

पिछले कुछ हफ्तों से महाराष्ट्र में वन्यजीव कार्यकर्ताओंराज्य सरकार और रालेगांव के ग्रामीणों के बीच कथित तौर पर आदमखोर कही जाने वाली एक शेरनी को लेकर गतिरोध चला है. इस शेरनी के दो शावक हैं. जब वन विभाग ने इसे गोली मारने का फैसला किया तो वन्यजीव कार्यकर्ता इस मसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट चले गए. कोर्ट ने उसे मारने पर रोक लगाने से मना कर दिया.

 

राज्य वन विभाग अगर उसे पकड़ने की कोशिशों में नाकाम रहता है तो उसे गोली मार सकता है. गैर-इंसानों द्वारा इंसानों को मारने का मसला हमेशा ही अविश्वास और आतंक से भावों से घिरा होता है. इसमें और बढ़ोतरी हो जाती है अगर किसी को हताहत या घायल करने का बताया गया कारण, एक बड़ा और शेर जैसा जाना-पहचाना जानवर हो. वन्यजीव कार्यकर्ता कहते हैं कि चूंकि ये एक दुर्लभ घटना है ऐसे में पुष्ट करना मुश्किल है कि कोई जानवर आदमखोर है या फिर कौन सा वाला शेर ही वो हत्यारा है. वहीं इस सिरे के दूसरी तरफ एक बेहद सच्चा डर है जो एक खतरनाक जानवर के करीब रहते हुए वो स्थानीय लोग महसूस कर रहे होंगे.

 

इस कारण से इन प्रश्नों के उत्तर देना बहुत जरूरी है. न सिर्फ ये कि वो जानवर कौन है बल्कि ये भी कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है. जो लोग वन्यजीवों की आवाज़ बनकर बोलते हैं जैसे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने वाले कार्यकर्ता हैंवे अकसर कहते हैं कि इसमें जानवर की गलती नहीं है बल्कि असली दोष मानवजनित दबावों का और इंसानों द्वारा फैलाई गई अशांति का है. सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी ही याचिका रणथंबोर के वनों में रहने वाले उस्ताद नाम के शेर के लिए लगाई गई थी. उस पर आदमखोर होने का आरोप था. उस्ताद को बाद में एक चिड़ियाघर में कैद कर दिया गया. ये महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप न करके अपनी जगह सही है क्योंकि वो ये तय नहीं कर सकता कि कोई जानवर आदमखोर होने का दोषी है कि नहीं. ये फैसला तो वन विभाग के नेतृत्व में एक स्वतंत्र और प्रामाणिक क्षेत्र आधारित प्रक्रिया पर ही छोड़ा जा सकता है.

 

शेरों और तेंदुओं जैसी बड़ी बिल्लियों के बीच हत्यारों की पहचान करने की प्रक्रिया अकसर अयोग्य कदमों से भरी होती है. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहले कई मौकों पर तेंदुओं को गोली मारी गई है लेकिन उससे पहले किसी निष्कर्षात्मक पहचान प्रक्रिया का प्रदर्शन नहीं किया गया. हर तेंदुए और शेर का अपना एक अलग धब्बों और पट्टियों का पैटर्न होता है. अगर ये पता करना है कि कोई शेर आदतन आदमखोर है या नहींतो उसके लिए सकारात्मक रूप से उसकी विजुअली और कैमरा ट्रैप तस्वीरों के जरिए पहचान करनी जरूरी है. आदमखोरों की पहचान के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि जांचों में ये जानकारी पता लगानी चाहिए कि एक शेर "आदम-हत्यारा" है या "आदम-खोर." क्योंकि "आदम-हत्यारे" वाली श्रेणी में मामले आदतन हत्याओं के बदले आकस्मिक होते हैं.

 

आदमखोरों का सामना कैसे किया जाता है इसे लेकर जो अनैतिक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं वे सामने आई हैं. वन्यजीव (संरक्षण) कानून 1972 के मुताबिक शिकार गैर-कानूनी है. संरक्षित वन्य जीवों को तभी मारा जा सकता है जब मुख्य वन्यजीव वार्डन ने इसकी मंजूरी दी हो और वो भी तब जब किसी इंसान की जिंदगी खतरे में हो. जहां आदतन आदमखोर जानवरों को कानूनी ढंग से हटाया या मारा जाना चाहिएवहीं ये ऑपरेशन सटीकचिकित्सकीय और सरकार द्वारा चलाए होने चाहिए. ये सैद्धांतिक और बदले की भावना वाले नहीं होने चाहिए. ऐसे "समस्या बने जानवरों" को मारने के बाद ऐसी तस्वीरों का फैलना आम है जिसमें मृत जानवर शूटर के कंधों पर लटकाया गया है या बंदूक की नोक पर शिकारी के कदमों में बिछाया गया है. इन तस्वीरों से पैसे देकर ट्रॉफी हंटिंग करने के मूल्य निर्मित होते हैं. इनसे बदला लेने का एक भ्रम पैदा किया जाता है. जबकि छवि ऐसे आधुनिक राज्य की होनी चाहिए जिसका एक कानूनी वन्यजीव संरक्षण मूल्य होता है जो लंबी अवधि के उपायों की दिशा में काम करता है. इस तरह की गतिविधियों के बाद दिसंबर 2016 में अपने न्यायिक फैसले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने वन्यजीवों के मृत शरीर को प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रदर्शित करने से स्पष्ट रूप से मना किया.

 

आदमखोरों के मसले पर समाधान को लेकर जो विमर्श है उसकी चिंता जानवरों के अधिकारों से ज्यादा वन्यजीव संरक्षण पर होनी चाहिए. संरक्षण जो है वो प्रजातियों की सततता चाहता है और ये लोगों के सहयोग के बिना संभव नहीं है. अच्छी संरक्षण प्रक्रियाएं ये समझती हैं कि वो ऐसे भौगोलिक दौर में हैं जहां पर्यावरण और जलवायु पर मानवों का दबदबा है और वे उसके भीतर ही कायम रह सकती हैंउसके बाहर नहीं. वहीं जानवरों के अधिकारों में जोखिमों की परवाह किए बगैर विशेष जानवरों की कुशलता की चिंता की जाती है. इसलिए ये चाहना कि एक आदतन आदमखोर को जिंदा रखा जाए अस्वीकार्य है. इंसान और जानवर का सह-अस्तित्व न तो लोक-लुभावनवाद के और न ही वन्यजीव अधिकारों के किसी एक चरम पर जा सकता है.

 

इस संघर्ष के लिए कौन जिम्मेदार है अगर इस मसले को संबोधित करना है तो हमें मानव-वन्यजीव संघर्ष के उत्प्रेरकों को और असहिष्णुता को कौन पैदा करता है इसे समझना होगा. बिना किसी मदद के गरीब आदमी को वन्यजीव संरक्षण की कीमत चुकाने के लिए नहीं कहा जा सकता है. इसके अलावा मानव-वन्यजीव संघर्ष की दिशा अकसर अन्य तरह के दबावों की वजह से भी बदलती है. लोगों की रोज़मर्रा की निराशाओं के लिए ये जानवर विशेष चिन्ह बन जाते हैं.

 

इसका एकमात्र उत्तर ये है कि ऐसा मजबूत क्षेत्रवार काम किया जाए जो उपायों का अनुकूलन करे. फसलों और पशुधन की बीमा योजनाओं को ज्यादा आसान और दोस्ताना बनाया जाना चाहिए और वन्यजीवों से दूरी बनाए रखने का व्यवहार लोगों को व्यापक रूप से बताया जाना चाहिए. वन विभाग को ऐसे संघर्ष के मामलों को न्यायपूर्णत्वरित और सिलसिलेवार ढंग से देखना चाहिए. तमाशेबाज़ी को हर हाल में टाला जाना चाहिए. लोगों की किसी जगह या आवास से जुड़ी अन्य समस्याओं को सुनने के लिए संवेदनशील व्यवहार रखना चाहिए. जैसे अगर उन्हें अपने पशुधन को बचाने में कोई दिक्कत हो रही है. आगे जैसे-जैसे मानवजनित दबाव जंगलों पर बढ़ रहे हैंवैसे-वैसे हमारे लिए सटीकस्थान-विशेष के उपाय चुनाव नहीं रह गए हैं बल्कि आवश्यकता बन गए हैं.  

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