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क्या समावेशी हिंदुत्व में सबकी भलाई है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समावेशी हिंदुत्व का दावा वास्तविक से कहीं ज्यादा क्षणभंगुर है.

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

जैसे जैसे आम चुनाव करीब आ रहे हैं विभिन्न राजनीतिक ताकतें अपनी राजनीतिक जगह बनाने या जगह बदलने के लिए सोची-समझी कोशिशें कर रही हैं ताकि जीत का सूत्र निर्मित कर सकें. इसमें ये भी रोचक है कि सबकी भलाई की धारणा के इर्द गिर्द ये जगह बनाने या जगह को बदलने का जो काम है ये परस्पर-विरोधी है. मसलन, जो विपक्ष में बैठे दल हैं वे ये सुझा रहे हैं कि वे एक-दूसरे के साथ और उस सार्वभौमिक नजरिए के इर्द गिर्द अपना स्थान बनाने को प्रतिबद्ध हैं जिसमें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और भय से आजादी जैसे मूल्यों का समावेश हो. वहीं धुरी की दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोगों को ये मनाने की कोशिशें कर रहे हैं कि सिर्फ हिंदुत्व में ही सबकी वैश्विक भलाई है. हालांकि संघ परिवार के प्रमुख द्वारा सोची समझी गणित के तहत एक "सर्व-समावेशी" स्थिति लेने की कोशिश आत्म-विश्वास का नतीजा ज्यादा है लेकिन उसमें से समतावादी यकीन गायब है.
 
उनके द्वारा एक भाषण श्रंखला के जरिए हद से आगे अपना हाथ बढ़ाने और मोदी-शाह के "कांग्रेस मुक्त भारत" वाले पालतू नारे से दूर रहने को इसी जगह बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. इसके अलावा आरएसएस ने जो ये उदार आकृति बनाई है इसे मौजूदा सरकार की नीतियों के खिलाफ लोगों के बढ़ते गुस्से के नतीजे के तौर पर भी देखा जा रहा है. हिंदुत्व का एक अतिरिक्त अर्थ चाहने की कोशिश बुनियादी तौर पर औपचारिक राजनीतिक सत्ता के पुर्जों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश से प्रेरित है. इसलिए आरएसएस का ये जताना कि वे औपचारिक राजनीतिक ताकत में "रुचि नहीं रखते", एक रक्षात्मक चाल है और असल में हिंदुत्व का अपना मकसद आगे बढ़ाने की एक संपुष्ट राजनीतिक इच्छा है. चुनावी मायने में इसका मतलब ये है कि लोगों के सामने आरएसएस का एक उदार चेहरा प्रस्तुत किया जाए.
 
लेकिन ज्यादा गंभीर होकर बात करें तो हमें समावेशी सार्वभौमिक भलाई के हिंदुत्व के दावे की आंतरिक विषय-वस्तु के बारे में बुनियादी सवाल उठाने की जरूरत है. ये दावा खोखला है क्योंकि हमारे सत्ता के तंत्रों से उत्पन्न हो रहे और न सुलझाए जा सकने वाले सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विरोधाभासों के प्रति ये असंवेदनशील है और बिना किसी मध्यस्थता वाला है. आरएसएस प्रमुख के ये जो दावे हैं ये सीधे ही हिंदुत्व को वैश्विक रूप से स्वीकार्य विकल्प बनाने में चले जाते हैं, बिना उस ज़मीन पर विमर्श किए जो इन विरोधाभासों से भरी पड़ी है. आरएसएस प्रमुख "समावेशी हिंदुत्व" के उस आखिरी बिंदु की ओर सीधे ही दौड़ रहे हैं. कमजोर समूह आज भी जैसी गुलामी भोग रहे है और असमानता, अन्याय व अपमान जैसी चीजें अभी भी बनी हुई हैं, इन सबका गंभीरता से सामना करने और विनम्रता से इन समस्याओं को स्वीकार करने की जरूरत की उन्होंने बिलकुल अनदेखी कर दी. 
 
समावेशी हिंदुत्व का ऐसा एकपक्षीय दावा इसलिए इस उदार भावना के साथ धोखा करता है क्योंकि ऐसा करते हुए उस सामान्य नियम का पालन भी नहीं किया गया जिसमें अपना आत्म-अवलोकन करने के लिए थोड़ा रुकना चाहिए और अपने सामने कुछ सवाल रखने चाहिए. मसलन, इस आत्म-अवलोकन का एक हिस्सा तो ये है कि आपके संगठन ने जाति, लिंग और साम्प्रदायिक हिंसा के सामाजिक उत्पादन में कितना योगदान दिया है? इसी अभ्यास के हिस्से के तौर पर हम उम्मीद करते हैं कि आरएसएस अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने का दावा करने से पहले इसकी आलोचना कर दे कि अंतर्जातीय शादियों में कितनी अधिक पितृसत्तात्मक असहिष्णुता फैली हुई है. ठीक इसी तरह इस संगठन के प्रमुख से ये अपेक्षा है कि "अतुल्य भारत" का प्रशंसागान गाने से पहले वरीयता देते हुए बहिष्कृत भारत की भी आलोचना कर दे. इसी संबंध में उनकी सक्रिय याद्दाश्य को ये याद दिलाना जरूरी है कि कैसे ज्योतिराव फुले और बी आर अंबेडकर ने मुख्यधारा के राष्ट्रवादी को समझाने के अनथक प्रयास किए कि वे बहिष्कृत भारत की मौजूदगी को खारिज करके उस कीमत पर पुरस्कृत भारत के विचार को तरजीह व विशेष अधिकार दे रहे हैं. हिंदुत्व को समावेशी बनाने के इनके दावों में जो ये आत्म-विश्वास दिखाई देता है ये दिखाता है कि आत्म-अवलोकन के लिए जो अति-आवश्यक नैतिक बल चाहिए होता है वो यहां नहीं है.
 
आत्म-अवलोकन न सिर्फ नैतिक बल्कि ऐसी आवश्यक सामाजिक चुनौती है जिसे विपक्ष को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है. इन चुनौतियों में, सामान्य प्रयासों के जरिए, ऐसा व्यावहारिक वैकल्पिक एजेंडा प्रदान करना शामिल है जो भारतीय गणतंत्र को लोकतंत्र और प्रतिष्ठा के लिए सुरक्षित बनाए. इस लिए विपक्ष के बीच सौहार्द पैदा करना एक काल्पनिक उम्मीद और अलंकार मात्र नहीं है, बल्कि एक कठिन चुनौती है. इस मामले में तो ये विपक्षी दलों के लिए बेहद जरूरी है कि व्यावहारिक वैकल्पिक नीतियों और कार्यक्रमों के प्रस्ताव सामने रखकर लोगों के असंतोष को एकजुट करें. ऐसे विकल्प को बड़ी तादाद में जनता की आजीविका के मसलों को संबोधित करना चाहिए और सामाजिक समावेश और स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बतानी चाहिए. ऐसे किसी कार्यक्रम की गैर-मौजूदगी से राजनीतिक प्रतिरोध का मैदान खाली ही पड़ा रहेगा और विपक्ष को लेकर जो लोगों का अविश्वास है वो बढ़ेगा ही. हम सभी जानते हैं कि व्यावहारिक राजनीति में ऐसा अविश्वास बीजेपी जैसे दल को मौका देता है कि वो एक गंभीर प्रतिस्पर्धी बना रहे. 
 
मौजूदा सरकार के द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने का सिर्फ विलाप करने या बार बार उसे फासीवादी कहने से लोकतंत्र की रक्षा नहीं होगी. ऐसा करने के लिए ऐसे एजेंडे की जरूरत होगी जो लोगों को राजनीति की ओर फिर से लेकर आए, जो लोगों के अविश्वास को दूर करके उन्हें अपने ही भविष्य को आकार देने में प्रमुख भूमिका और सक्रिय भूमिका अदा करने की तरफ ले जाए. लोगों का भविष्य सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि वे गरिमाभरी आजीविका, गुणवत्ता भरी जिंदगी और एक सभ्य व मानवीय समाज के निर्माण जैसे सबसे महत्वपूर्ण मसलों पर एकजुट होते हैं कि नहीं. अगर दलित-आदिवासी महिला संगठनों, वामपंथी दलों, जन संगठनों और जन आंदोलनों की छिटपुट, बिखरी हुए और अलग-थलग लामबंदियों को छोड़ दें तो ऐसा परिवर्तनकारी एजेंडा अभी तो मुख्यधारा के विपक्षी दलों के दिमाग और गतिविधियों से अनुपस्थित ही है. इस अनुपस्थिति में संभावना है कि विपक्षी दलों के भीतर ही अव्यवस्था का ये सबसे प्रमुख कारण बन सकती है.
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