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क्या ट्रंप गद्दार हैं?

ट्रंप पर गद्दारी का आरोप लगाने के असली वजहों को जानना जरूरी है.

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

कोई यह नहीं कह सकता कि यह अनापेक्षित था. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बीच हेलसिंकी में होने वाली शिखर वार्ता के चार दिन पहले 13 जुलाई को अमेरिका के डिप्टी अटार्नी जनरल रोड राॅसेंसटिन ने 12 रूसी गुप्तचरों को डेमोक्रेटिक पार्टी के चुनाव अभियान समिति के प्रमुख को ईमेल हैक करने और इसे विकीलिक्स को देने का आरोप लगाया. इसके आधार पर मीडिया और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने यह दावा किया कि रूस ने अमेरिकी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाया है.
 
2016 के चुनावों में रूस की दखल के पक्ष में तथ्य कम लेकिन बातें ज्यादा हैं. विकीलिक्स का नाम आने से डेमोक्रेटिक पार्टी को यह भी लग रहा है कि इससे इसके खिलाफ चलाई जा रहे अभियानों को बल मिलेगा. हालांकि, एडवर्ड स्नोडन ने सीआईए के टाॅर्चर और नैशनल सिक्यूरिटी एजेंसी द्वारा अमेरिकी नागरिकों की जासूसी से संबंधित जो बातें सामने लाई हैं, उनसे से इन एजेंसियों की पोल खुल गई है. स्नोडन रूस में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं.
 
16 जुलाई को हेलसिंकी में ट्रंप और पुतिन के बीच क्या बात हुई, इस बारे में कुछ खास सामने नहीं आया. ऐसा लगता है कि ट्रंप ने रूस के दखल के आरोपों पर अमेरिकी एजेंसियों की बात मानने के बजाए पुतिन की बात मानना ज्यादा उपयोगी समझा. संयुक्त प्रेस वार्ता में कभी रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी में काम कर चुके पुतिन ने कहा कि उन्हें मालूम है कि आरोपों का पुलिंदा कैसे तैयार किया जाता है. 
 
बराक ओबामा के साथ काम करने वाले सीआईए के निदेशक जाॅन ब्रेनन हेलसिंकी में ट्रंप के व्यवहार को गद्दारी करार दिया. न्यूयाॅर्क टाइम्स के स्तंभकार थाॅमस फ्रीडमैन ने ट्रंप को रूसी खुफिया एजेंसी के लिए एक धरोहर कहा. उन्होंने अमेरिकी लोगों से यह सवाल भी पूछा कि आप ट्रंप और पुतिन के साथ हैं या फिर सीआईए, एफबीआई और एनएसए के साथ?
 
हमें उन उदारवादियों से पूछना होगा कि क्या वे खुफिया एजेंसियों के साथ खड़ा होना चाहते हैं? क्या इस मामले में या तो ट्रंप या फिर इन एजेंसियों का साथ देने का ही विकल्प होना चाहिए? इन एजेंसियों ने ईराक में परमाणु हथियार होने का दावा गढ़ा था. यही एजेंसियां लोगों की जासूसी करती हैं. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया, सोमालिया और यमन जैसे देशों में यही एजेंसियां ड्रोन लगाती हैं और सैंकड़ों आम लोगों को नुकसान पहुंचाने से भी इन्हें परहेज नहीं है.
ट्रंप के विरोधी यह चाहते हैं कि रूस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया जाए. शीत युद्ध के बाद पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में जो जगह खाली हुई है उसमें अमेरिका सबसे मजबूत बनना चाहता है. इसके लिए अमेरिका ने आतंकवादियों तक का इस्तेमाल किया है. रूस के दखल के मसले पर अमेरिकी प्रशासन में दो राय है. इस बात पर सहमति नहीं बन पा रही है कि किस रास्ते पर आगे बढ़ा जाए. इसलिए ट्रंप ने जो किया है, वह उनकी एक ऐसी चाल है जिसके जरिए उन्हें अपनी रणनीति बनाने के लिए थोड़ा वक्त और मिल सके.
 
यह रुख सोच-समझकर अपनाया गया है लेकिन इसके बावजूद ट्रंप को गद्दार कहा जा रहा है और यह आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने अमेरिकी हितों को पुतिन के हाथों बेच दिया है.
Updated On : 31st Jul, 2018
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